रूबी की माँ काफी परेशान है, उसका मन भारी-भारी
है, चिंता से उसके चेहरे पर जो रेखाऎं उभर आईं हैं वे काफी गहरी दीख रहीं है. वह उस खतरे के बारे में ज्यादा
नहीं सोचना चाहती, पर मन है कि बार-बार वहीं जाकर अटक जाता है. अन्दर ही अन्दर एक
लहर-सी उठती है और वह काँपने लगती है, घबराहट के मारे चेहरे पर पसीने की बूँदें
जमा हो गईं हैं, फिर भी वह संयत बनाये रखी है. वह नहीं चाहती कि रूबी उसके इस
स्थिति को समझे क्योंकि यदि वह कमजोर पड़ गई तो सबकुछ बिखर जायेगा. इसलिए वह भय के
भाव को प्रकट नहीं होने देना चाहती. उसके सामने आने से पूर्व वह चेहरे को अच्छी
तरह साफ कर लेती है. आइना में मुखरा इधर-उधर घुमाकर वह परख लेती है और फिर बनावटी मुस्कान के साथ अवतरित
होती है.
Sunday, 28 May 2017
Friday, 10 February 2017
एक थी यमुना
एक थी यमुना। वह बहुत प्यारी थी, ममता की मूरत थी, दादी-नानी की लाडली थी। कई किस्से-कहानियाँ उसके बारे में प्रचलित थीं। गाँव-गाँव में सदियों से उसकी महानता के बारे में कहा सुना गया था। वह जीवनदायनी थी। देवी थी। वह देवी गंगा की जुडुआ बहन थी। लोग उसे माँ समझते थे, पर वह एक नदी थी। हजारों गाँवों को सींचने-सवाँरने वाली, लाखों-करोडों लोगों को सदियों से पालने-पोसने वाली, वास्तव में वह मानव सभ्यता की जननी थी। मनुष्य ने जब पहला कदम उसके गोद में रखा तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह अपनी माँ के आँचल की छाँव में आ गया हो। वही जुडाव जो अपनी माँ से होता है लोगों ने महसूस किया था। लोग उसकी शरण में सुरक्षित रहते थे।
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