मैं
जब जागी तो सवेरा हो चुका था. सूरज की रोशनी बरामदे में आ चुकी थी. स्ट्रीट लाईट
का तेज प्रकाश कांच के बल्ब के मध्य एक बिन्दू पर सिमट गया था. घुप्प अंधकार को चीरता
हुआ कोई तेज प्रकाश पुंज जब आंखों में लगता है तो चुभन होने लगती है. ठीक उसी तरह फर्श
की सतह से परावर्तित किरणें जब मेरी आंखों से टकराई तो मुझे चुभन महसूस होने लगी,
मैं उठकर बैठ गई और दोनों हथेलियों में आंखों को छुपा लिया.
आज
की सुबह भी अन्य दिनों की तरह ही थी, बाहर कुछ भी नहीं बदला था, वही झूमते हुए पेड़
बगीचे में डोल रहे थे, क्यारियों में गुलाब की पंखुरियां उड़ रहीं थीं, गौरैया छ्त
से लटकती रस्सियों पर फुदक रही थी. सब कुछ पूर्ववत ही था, यदि कुछ बदला था तो घर
के अन्दर बिस्तर पर..... मैं आश्चर्य चकित
थी दादी को देखकर, वह अभी तक सोई चादर में लिपटी हुई गहरी सांसे खींच रही थी.
जबकि
भोर के अंधेरे में ही बिस्तर छोड़ देना उनकी आदत में शुमार था, सबेरा होने तक वह
नित्य-क्रिया से निपट कर स्नान कर लेती थी, उसके बाद वह ध्यान और पूजा-पाठ करती थी.
मैंने
उन्हें जगाने की बहुत कोशिश की, उनके हाथ पकड़ कर झकझोर दिया, लेकिन वह नहीं जागी. उन्होंने
हाथ-पैर पसारे.. और फिर से वह चादर में सिमट गई.
“दादी आज उठ ही नहीं रही है…”, मैं परेशान होकर एक-दो बार बुदबुदायी थी. किंतु
मेरी आवाज कमरे में जज्ब होकर रह गई.
कुछ
देर तक मैं यूं ही बैठी रही, तभी ठंढी हवा का झोंका खिड़की के रास्ते आया और मुझे छूकर
निकल गया, हल्की-सी ठंढक महसूस हुई थी, मेरा शरीर कांप उठा था. फिर अचानक ही मैंनें
अपने ऊपर से चादर हटा दी और मैं बिस्तर से उठकर फर्श पर खड़ी हो गई. कमरे के बाहर नन्ही
डौगी क्वाइल की तरह सिमट कर सूखे फूश पर लेटी पड़ी थी. धूप की खामोश गर्मी से उसके
शरीर का रोयां फैल गया था. लॉन में एक सूखी नीरवता पसरी हुई थी, यद्यपि कभी-कभी हवा
के वेग से कांपते पत्तों की सरसराहट की सिसकारी गूंज उठती थी.
आज
वहां कोई भी नहीं था, गोलू भी नहीं. वह मेरे पड़ोस में रहता था. उसे नहीं पाकर मैं उसके
कमरे में गई. वह भी अभी तक सो रहा था.
लो... , आज सबके सब अभी तक सो रहे हैं.... , अच्छा होता
यह कि मैं भी वापस बिस्तर पर लेट जाती.... लेकिन अब नहीं ....
मैंनें
गोलू को जगाने की कोशिश की, परंतु कुछ सोचकर रूक गई. उसका गोल-गोल लाल चेहरा चादर
से उघरा मेरे सामने पड़ा था. एक स्वच्छ मुस्कान उर्मियों की तरह फैल और सिकुड़ रही
थी. मेरा ध्यान उस पर टिक गया. मैं निहारने लगी, उन उर्मियों को ताड़कर उसके मन में
चल रहे भाव को समझने की कोशिश करने लगी.... कि अचानक ही सब स्पष्ट होने लगा- अरे,
अरे, यह कोई स्वप्न देख रहा है... हां, हां, यह स्वप्न ही देख रहा है.
स्वप्न
का ख्याल आते ही मेरा मन प्रसन्नता से भर गया. मुझे लगा-- वह जरूर लड्डू का स्वप्न
देख रहा होगा....क्योंकि वह अक्सर लड्डू की बातें करता रहता था.... और लड्डू उसे पसन्द भी था. गोल-गोल लड्डू... वह जरूर खा रहा होगा...
मैंनें
किसी से सुना था कि सवेरे का सपना सच होता है.
“क्या सचमुच सवेरे का सपना सच होता है ?”
एक गुब्बारा मेरे
अन्दर फूलने लगा- .हां, हां, सच होता होगा
तभी तो सभी कहते हैं. उस दिन पड़ोस वाली आंटी भी कह रही थी.... तब तो गोलू का सपना
सच होगा.... और उसे जरूर लड्डू मिलेगा .... .
फिर
तो उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं. उसे सोता छोड़ मैं अपने घर चली आई.
“मम्मी-मम्मी, क्या सवेरे का सपना सच होता है ?” मैंने माँ से पूछ लिया था.
पर उसने इसका कोई जवाब नहीं दिया, शायद
उसने अनसुना कर दिया था, उसे इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं मालुम था या काम में वह
इतना व्यस्त थी कि इसका उत्तर देना उसे आवश्यक नहीं लगा.
मैं
जब वापस कमरे में आई तो दादी जाग चुकी थी. अन्य दिनों जब वह भोर में जागती थी तो
काफी खुश रहती थी. वह मुझे बहुत प्यार करती थी, कभी-कभी गाना या भजन भी सुनाती थी,
उसके बाद वह मम्मी के कामों में हाथ बटाती थी. पर आज वह बिस्तर पर शांत-चित बैठी
हुई थी, उनका मूड कुछ उखड़ा-उखडा सा लगा. वह किसी चिंता में खोई हुई थी.
लेकिन मुझे
तो अपने सवाल का जवाब चाहिए था, मैनें दादी को भी वही सवाल दाग दिया, “दादी, दादी, सवेरे का सपना सच होता है न ?”
दादी ने भी कोई उत्तर नहीं दिया, उल्टे उनका
चेहरा सख्त हो गया, उपर के दाँत निचले होंठ में धंस गये और वह मेरी ओर इस तरह
गुर्रा कर देखने लगीं जैसे कोई बिलाव चूजे को देख रहा हो.
मैं बुरी तरह डर गई और चुप-चाप कमरे से बाहर आ
गई थी.
“दादी को क्या हो गया
है ?” उसमें आये इस बदलाव से मैं हैरान हो गई थी.
आज
दादी पूजा-पाठ कर जब कमरे से बाहर आई तो उसकी आंखें बुझी हुई चिंगारी की तरह दीख
रहीं थीं जो सूजे पलकों के मध्य छुप सी गई
थी. उसके ललाट पर चिंता की रेखायें साफ-साफ नजर आ रहीं थीं. उसके व्यवहार में वास्तव में बदलाव आ गया था.
आज न तो वह माँ की तबियत के बारे में कुछ पूछ रही थी और न ही उसे काम में मदद कर
रही थी. उठते-बैठते, काम करती माँ को उसने आज एक बार भी यह नहीं कहा कि ‘जरा संभल कर’, यद्यपि कि जब से माँ का शरीर भारी
हुआ है वह दिन में दस दफे यही दुहराती रहती थी. वह उसे समय पर दवा-दारू देती थी एवं
उसके अंदर हो रहे पल-पल बदलाव पर पैनी नजर रखती थी. उसकी छोटी से छोटी तकलीफों का भी
वह ख्याल रखती थीं. परंतु आज तो जैसे उसे उसकी कोई परवाह ही न हो.
उसने
बड़ी तल्खी-से खराश भरी अवाज में माँ और पापा को बुलाया था.
पापा
दौड़े हुए आये थे, “क्या है ? माँ, क्या है ?”
माँ
भी आ गई थी.
वे
सभी आपस में बातें करने लगे.
मेरे
अन्दर फिर से वही गुब्बारा फूलने लगा, मैंनें सोंचा- क्यों न इस बार पापा से पूछ
लिया जाय..., “पापा, पापा, सवेरे का सपना सच होता है न ?”
पापा
ने कोई जवाब नहीं दिया, वे बातों में मशगूल थे.
“बोलिए न, पापा ! बोलिए न, बताते क्यों नहीं ?”, मैंनें उनका हाथ पकड़ कर खींचना शुरू कर दिया.
“चुप्प.....” दादी ने डांट दिया था,
डांट
सुनकर मेरी आवाज मुंह के अन्दर ही दब गई. मैं रुआंसा हो गई, मेरी आंखें भर आईं और
दुखी होकर मैं एक कोने में चली गई.
पापा
यह देखकर परेशान हो उठे, मुझे खींचकर उन्होंने पास बुला लिया और पुचकारने लगे.
तभी
दादी की आवाज एक बार फिर गूंज उठी, “ज्यादा लाड़ करने की जरूरत नहीं, छोड दे.... लड़की जात
है, मनबढ हो जाएगी तो गले की फाँस बन जाएगी.”
पापा
दादी को देखते ही रह गये थे ..... आज क्या हो गया है इन्हें ? पहले तो कभी वह इस
तरह नहीं बोलती थी.
वे
पुन: बातों में उलझ गये. दादी पापा से कह रही थी,
“मालती को
अल्ट्रासाउंड करा कर देख लो..., सुनो, देर करना ठीक नहीं है ... ज्यादा देर करने से
दिक्कत बढ सकती है.”
उन्हें उनकी बात समझ में नहीं आई, “क्या....? ... अल्ट्रासाउंड ?... क्यों.... ?”.
“अल्ट्रासाउंड ....क्यों ? लिंग परिक्षण के लिए...?” माँ फुसफुसायी थी.
“क्या लिंग परिक्षण... ? यानि आप कह रही हैं कि
मालती के गर्भ का लिंग परिक्षण करायें.”
“
यह तो सरासर गलत
है.... कानूनन अपराध है....... कौन करेगा ?”
“तू इसकी चिंता मत कर, मेरा भतीजा है न दीपक, वह
किसी पैथोलोजिस्ट के यहाँ ही रहता है.... उससे बातें कर ले और आज ही चला जा.”
“इतनी जल्दी... क्यों माँ ? अचानक से यह सब बात
तुम्हारे मन में कहां से आई...... ?”
“मैं जितना कह रही हूं उतना कर.... ..”
वे विवश हो गये थे, उनके जिद्द के सामने
उनकी एक न चली थी.
वे तैयार होकर घर से निकल पड़े. बस स्टॉप
थोड़ी दूर पर था जहां से शहर के लिए बस मिलती थी. शहर में ही डॉक्टर और पैथोलोजिस्ट
थे जहां उनकी जांच हो सकती थी.
हलांकि पापा और माँ ने दादी की बातें
मान तो ली थीं, पर अन्दर ही अन्दर वे काफी परेशान थे और अचम्भित भी.... आखिर क्या
बात हुई थी दादी के साथ ..? दादी ने अचानक लिंग परिक्षण कराने का निर्णय क्यों लिया
...? इस तरह के कई प्रश्न उन दोनों के मन के आकाश में बादल की तरह घुमड़ने लगे थे. जितने
प्रश्न उतने ही उत्तर... पहेलियों का जाला बिछा हुआ था जिसमें वे उलझ कर रह गये
थे. एक भी सूत्र ऎसा नहीं मिला जिससे उन्हें यह समझ में आ जाती कि दादी ने ऎसा
फैसला क्यों लिया ?
शाम
ढल रही थी, परंतु पापा और माँ अभी तक नहीं लौटे थे. बगीचे में पेडों की फुनगी
सिन्दूरी होने लगी थी, गुलाब की पंखुडियां सिमट कर पत्तों के बीच आ गईं थीं और गौरैया
चोंच में दाना लिए घोंसलों की ओर उड़ चली थी. मैं बरामदे में गोलू के साथ खेल रही थी और दादी
कमरे में बैठी हुई उनके आने का इंतजार कर रही थी. मैं आज दादी के पास एक बार भी नहीं
गई और न ही दादी ने मुझे बुलाया था. मुझे भी मम्मी-पापा का इंतजार था. मैंने गोलू से
कहा, “मम्मी- पापा आ ही रहे हैं, वे जरूर लड्डू लाऎंगे.. , तुम्हें
खिलाऊंगी... तुमने सपना देखा था न...., सवेरे का सपना सच होता है...... तुम्हें
लड्डू अवश्य मिलेगा. ”
तभी खट-खट की आवाज सुनाई पड़ी, शायद दरवाजे
पर दस्तक हुई थी. मैं दौड़ कर गई, दादी भी पीछे-पीछे गई. मैंने दरवाजा खोला. बाहर
स्ट्रीट लाईट के खम्भें पर लटके बल्ब से रोशनी का फब्बारा फूट रहा था. पेड़-पौधे,
चारदिवारी और मकान सब कुछ दूधिया रंग में पुता हुआ दीख रहा था. हम दोनों ने
इधर-उधर देखा, पर वहां कोई भी नहीं था. हमें जरा-सी मायूसी हुई थी. हम वापस लौट कर
अपनी-अपनी जगह आकर बैठ गये और फिर से उनका इंतजार करने लगे.
वैसे
तो दादी की आंखों के सामने वैसा कुछ भी नहीं था, केवल एक मीटर के फासले पर एक सादी
दीवार खड़ी थी और झिलमिलाती रोशनी में उसपर चमकती किसी देवी की मुर्ती टंगी थी, पर
उनके मन के अन्दर... उनके मन के अन्दर ऎसा कुछ था जो आज सवेरे से ही उनके होश
उड़ाये था, जो लावा की तरह धधक रहा था, जो
आग की लपटों की तरह उछल रहा था और बार-बार मन के दरवाजे से निकलकर उनकी आँखों के
सामने घूम जा रहा था. वह एक दृश्य था... जिसे आज उन्होंने सवेरे के सपने में देखा
था.
उन्होंने
सपने में देखा–एक नन्हीं सी नवजात
बच्ची माँ के बगल में लेटी है... . वह उसे
ध्यान से देख रही है .....यह लड़का है...या लड़की ? वह उसे पहचानने की कोशिश कर रही
है. .. हाँ, हाँ...., लड़का है.... यह लड़का
है, उसे उलट-पलट कर देखती है, नहीं, यह
लड़की है ... लड़की है..... लड़की ही है. हाँ, हाँ, स्पष्ट है, यह.. ..लड़की ही है
....
.....और जब उनकी आँखें खुली
तो एक खंजर उनके सीने में घोंपा हुआ था. उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थीं— फिर… लड़की...! दूसरी संतान भी.. लड़की ! यह क्या..? नहीं, नहीं, यह तो अनर्थ है... अब
और लड़की नहीं चाहिए.... लड़की से वंश कैसे आगे बढेगा.. ?
वह चिंतित हो उठी. कुछ देर
तक उसीके बारे में सोचती रही..., वह इस कदर खो गई थी कि उन्हें होश-हवास ही नहीं
था. वह एक निर्जीव पत्थर की मूर्ति की भाँति बैठी हुई थी, पर उस पत्थर के अन्दर एक
कोमल मन था, जिसमें बवंडर की लहरें एक के बाद दूसरी... लगातार उठ रही थी—यह तो बड़ी मुशीबत है...
यह क्या हो गया... ? ... अब क्या होगा..?
लेकिन जल्द ही उन्हें समझ में आने लगा –अरे, यह
तो सपना था और सपने को लेकर चिंता क्यों ? यह तो बेवजह परेशान होने की बात है.
पर
मन था कि मान ही नहीं रहा था, घबराहट ज्यों कि त्यों बनी हुई थी, बहुत कोशिश के
बाद भी शांति नहीं मिली. उन्होंने मन को बहलाने की बहुत कोशिश की .... , किंतु
सीने में धंसा खंजर निकाल ही नहीं रहा था शायद इसलिए कि उन्हें आशंका था सवेरे का
सपना सच होने का...
“नहीं.. नहीं.. कुछ तो करना पड़ेगा.... ”, वह मन ही मन बुदबुदाने लगी .
दूर शहर से मानों कोई देवदूत आया हो, उसके हाथ में एक पोटली थी, उसमें एक
फाइल था और उस फाइल में सफेद कागज पर सुनहले अक्षर जड़े हुए थे. दादी उसे पढने की
कोशिश कर रही थी, तभी उनके हाथ काँपने लगे, आँखों की पुतलियाँ डोलने लगी, दिमाग की
बत्तियाँ झिलमिलाने लगीं– क्या, सवेरे का सपना सच हो गया ? ... एक टीस सिर से उठकर
पूरे शरीर में फैल गई. वह बेचैन हो उठी. आशंका को दूर करने के लिये उन्होंने पलकों
को फैलाया, नजरें पास ले गईं और आँखें फाड़कर रिपोर्ट समझने की कोशिश करने लगी, लेकिन
व्यर्थ... कुछ भी समझ में नहीं आया, सब कुछ धुंधला हो गया था, प्रकाश इतना था कि
उसकी चमक में कुछ भी स्पष्ट नहीं दीख रहा था.
तभी कमरे में स्वच्छ हवा प्रवेश
कर गई और चकरी होकर घूमने लगी, वातावरण में बेली की सुगन्ध व्याप्त हो गयी थी. दादी
ने खिड़की की ओर देखा, बाहर अंधेरे का सम्राज्य फैला हुआ था. पापा और माँ अभी तक
नहीं लौटे थे. उनकी बेचैनी बढ गई. वह कमरे में ही चहलकदमी करने लगी. उनके मन में वही
दृश्य फिर से घूमने लगा—एक नन्हीं सी नवजात बच्ची माँ के बगल में लेटी है...
. यह लड़का है...या लड़की ? .. हाँ....हाँ...
लड़का है.... यह लड़का है, नहीं, यह लड़की है
... लड़की है..... लड़की ही है, ....लड़की ही है.
.....
और उनकी आँखों के सामने फिर से निराशा छा गई. वह वापस कुर्सी पर बैठ गईं और आँखें
बन्द कर उन दोनों का इंतजार करने लगी.
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