Tuesday, 28 June 2016

तमाशबीन



          मुहल्ले के नुक्कड़ पर एक नीम का पेड़ था और उसके नीचे कूड़े का ढ़ेर… पॉलिथीन की थैलियाँ, कागज के टुकड़े, सड़ी हुईं सब्जियाँ, रसोई के कचरे, जूठन, गोबर इत्यादि यत्र-तत्र फैले हुये थे, जिससे बदबू भरी हवा उठती रहती, दोपहर के बाद जब गर्मी बढ़ जाती तो बास मारने लगती थी। कभी-कभी समस्या गंभीर हो जाती तो आस-पास के घरवाले उस तरफ की खिड़की बन्द कर लेते थे। पास से गुजरनेवाले नाक पर रूमाल डाल लेते थे,यदि बहुत दिक्कत होती तो उधर से मुँह फेर लेते या रास्ता बदल लेते थे। 
           कूड़े का कुछ हिस्सा उड़-उड़ कर नाली में जाने लगा और धीरे-धीरे नाली जाम हो गयी। पानी उछलकर सड़क पर बहने लगा था। कार सवार उधर से गुजरते तो कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते क्योंकि उसका सीसा बन्द रहता था, उन्हें कुछ पता नहीं चलता था। कागारा बनाती हुई गुजर जाती थी। सायकिल या बाईक का  पहिया उस गंदे पानी में छपछपाता चलता तो बाईक सवार मुहल्लेवाले को गाली देते, उन्हें बूरा-भला कहते. लेकिन पैदल चलनेवाले ज्यादातर उसी मुहल्ले के होते, उन्हें ही सबसे ज्यादा दिक्कत होती थी। वे जब अकेले होते तो किसी तरह बच-बचाकर चुप-चाप निकल जाते, परंतु एक से अधिक, दो या तीन होने पर चर्चा अवश्य छेड़ देते थे। जब चर्चा शुरू हो जाती तो नुक्कड़ के कोनेवाले घर के तिवारीजी स्वंय को रोक नहीं पाते और बड़बड़ाते हुए निकल पड़ते, दुनियाँ भर के लोग आते हैं –जाते हैं, किसको क्या पड़ी है ? रात- दिन रहना तो हमें है....नरक भोगने के लिये तो हम ही हैं।
            पड़ोस का लौंडा दिनभर न जाने कहाँ मारा-मारा फिरता, पर ऎसे वखत अवश्य टपक पड़ता, देख चचा, एक अर्जी दे दो म्युनिसपैलिटी में.... अभी, सब ठीक हो जायेगा...
           क्या ठीक हो जायेगा... दसियों अर्जी दे डाली... पर कोई सुनता कहाँ है ?
           सुनेगा, सुनेगा... सब सुनेगा.. , चलो... मेरे साथ...
           तू .. तू क्या उखाड़ लेगा... म्युनिसपैलिटी वाले बड़े नमकहराम हैं...!
           अरे चचा... खाली हाथ जाओगे...तो कौन सुनेगा.. जेब भरके जाओ न.., उसने पन्नी फाड़ी और सारा मसाला मुँह में उड़ेल लिया. 
           ये कोई मेरे बाप की सड़क है... जो मैं जेब भरके जाऊँ.. समाज का काम है दस भाई के जिम्मे है .. जो चाहे करें.
           सुनो... सुनो.. समाज की दुहाई मत दो... बस्स.. यहाँ पर चार घर हैं..., इन्हीं चार घरों का कूड़ा पड़ता  है... , गुप्ताजी ने अँगुली दिखाते हुए कहा ।
          चार ही घर क्यों ? पानी तो पूरे मुहल्ले का बहता है.. पानी है.. तबही तो कूड़ा सड़ रहा है.तिवारी जी का पड़ोसी बोल उठा..
          सुनो भाई कोहली... बूरा मत मानना... ये कूड़ा जाता है नाली में ... नाली हो जाती है बंद .. तो पानी कहाँ जायेगा..?
            बात बढती जा रही थी.. लोग घरों से निकलकर भन-भनाते हुए पेड़ के नीचे जमा हो रहे थे । जिसके समझ में जो आ रहा था बोले जा रहे थे. कुछ देर बाद रामप्रसाद जी आ गये... रामप्रसाद जी वार्ड मेम्बर थे ।  उन्होंने सबको चुप कराने की कोशिश की..., सुनो.. सुनो, लड़ने-झगड़ने से कुछ नहीं होगा... शांति से समाधान निकालो...
           ... तो तुम्ही कुछ करो न, तुम तो राजनीतिक आदमी हो, एम0 एल0 ए0 साहब से भी जान-पहचान है, उनसे कहकर क्यों नहीं करवाते हो...?  मुहल्ले में जगह-जगह कूड़े पड़े हैं उसे हटवाओ ... तुम तो करवा सकते हो.., कोहली लपक पड़ा था.
          वो तो ठीक है... पर एम0 एल0 ए0 यादवजी तो समाजवादी पार्टी के हैं...वे क्यों करेंगे.. ?  उनसे कहो..., जिसने स्वच्छता अभियान चला रखा है... जिसने जगह-जगह सफाई करते हुए फोटो खिंचवाई थी. अखबार, टी0बी0 सभी जगह झाड़ू के साथ जिनका फोटो अटा पड़ा था.
          तो क्या परधानमंत्री यहाँ पर आकर झाड़ू लगायेंगे... ?मिश्राजी असहज होकर बोल गये.
          प्रधानमंत्री को कौन कह रहा है ? ... एस0एम0एस0 वाले उनके सदस्य कहाँ गये...? जो लाखों की संख्या में हैं... इस मुहल्ले में भी दो-चार, दस तो होंगे ही..., रामप्रसादजी ने पुनः कटाक्ष किया ।
          वो तो ठीक है, पर यहाँ पालिटिक्स की जरूरत ना है..
          पालिटिक्स तो वे लोग कर रहें हैं... जो झंडा लेकर घूम रहे हैं बी0जे0पी का.. और काम के लिये मुँह ताक रहे है स0पा0 का...
          देखो.. नेताओंवाली बात मत करो..., सबको मालूम है.. कि कौन पार्टी कैसी है.. अभी बताने लगेंगे तो भाग खड़े होगे..,मिश्राजी तैश में बोल रहे थे।
            रामप्रसादजी भी पीछे हटनेवालों में नहीं थे।  वह भी जोर-जोर से बोलने लगे। वे दोनों एक-दूसरे की बातों पर कैंची चला रहे थे। बात बिगड़ती देख लोगों ने दोनों को चुप कराने की कोशिश की.. कुछ लोग रामप्रसादजी को एक तरफ़ ले गये तो कुछ ने मिश्राजी को दूसरी तरफ..
           झग़ड़ा शांत हो गया, भीड़ तितर-बितर हो गई... सभी लोग अपने-अपने घरों में चले गये।
           नाली का पानी सड़क पर मचलता हुआ बह रहा था। बजबजाते कूड़े में कीड़े रेंग रहे थे.. और मच्छरों का झुंड आराम से वंशबृद्धि कर रहा था।  
          दस-बारह मजदूरों का समूह जो अभी-अभी वहाँ पर आया था, जो मुहल्लेवालों के झगड़े का तमाशबीन बना था तथा जिनके हाथों में कुदाल और फावड़ा था, उनकी इच्छा हुई थी कूड़ा साफ कर नाली का पानी खोल देने की, पर उन्होंने सोचा—बड़ी कोठी वाले जब संवेदनहीन होकर लड़ रहें हैं...,  उन्हें गरज नहीं है तो हमें क्या...? हमें कौन मजदूरी मिलनेवाली है...  या बख्शिश मिलनेवाली है....
          वे भी पानी में पैर छपछपाते आगे बढ़ गये थे.. 
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