भोर का
समय था। ट्रेन के स्टेशन पर रूकते ही लोगों का चढना-उतरना शुरू हो गया । उतरने
वालों में कुछ लोग वे थे जिनका गंतव्य आ चुका था और कुछ वे जो गर्मी के मारे बेहाल
थे तथा प्लेटफार्म पर ठंढी हवा में जी भर साँस लेना चाहते थे। चढनेवालों में कुछ
यात्री थे तथा कुछ चायवाले, दातुन वाले, खोमचे वाले जो सामान बेच रहे थे।
शोरगुल काफी बढ गया था । मेरी आँखें खुल गईं। मैं बैठ गया। तभी मैंने देखा- चढनेवालों में एक भिखारी भी था, वह दुबला-पतला था और मट-मैला कपडा पहने था। वह गूंगा था । ताली बजाकर लोंगो का ध्यान आकृष्ट करता और सामने खड़ा हो जाता था। जब वह मेरी पत्नी के सामने आया तो उसे दया आ गई। उसने पर्स से दस रूपये का नोट निकाला और उसके डब्बे में रख दिया। भिखारी आगे बढ गया अगले आदमी के पास । उस आदमी ने उसे टरका दिया, “ जा हट, आगे बढ ।”
शोरगुल काफी बढ गया था । मेरी आँखें खुल गईं। मैं बैठ गया। तभी मैंने देखा- चढनेवालों में एक भिखारी भी था, वह दुबला-पतला था और मट-मैला कपडा पहने था। वह गूंगा था । ताली बजाकर लोंगो का ध्यान आकृष्ट करता और सामने खड़ा हो जाता था। जब वह मेरी पत्नी के सामने आया तो उसे दया आ गई। उसने पर्स से दस रूपये का नोट निकाला और उसके डब्बे में रख दिया। भिखारी आगे बढ गया अगले आदमी के पास । उस आदमी ने उसे टरका दिया, “ जा हट, आगे बढ ।”
वह
आगे बढता गया, किसी ने पाँच रूपये, किसी ने दो रूपये.... किसी ने एक रूपये, लगभग सभी
ने कुछ न कुछ दिया। माँगते हुए वह कम्पार्टमेंट के
अंतिम छोर पर पहुंच गया था । वहां एक आदमी उसे देखते ही भड़क गया, “ तू गूंगा है रे....? स्साला ढोंगी है... इसे कोई कुछ मत दो। ”
भिखारी
सहम गया, लेकिन अचानक ही उसके तेवर बदल गये। वह क्रोधित हो गया और बोल उठा, “तुझे नहीं देना है तो मत दे, पर धंधे पर
लात मत मार....”। ...और वह तेजी से कम्पार्टमेंट से बाहर चला गया।
हमारी आंखें खुली कि खुली रह गईं, हम आश्चर्यचकित
रह गये और ठगा-सा महसूस करते हुए एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।
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