मुहल्ले के नुक्कड़ पर एक नीम का पेड़ था
और उसके नीचे कूड़े का ढ़ेर… पॉलिथीन की थैलियाँ, कागज के टुकड़े, सड़ी हुईं सब्जियाँ,
रसोई के कचरे, जूठन, गोबर इत्यादि यत्र-तत्र फैले हुये थे, जिससे बदबू भरी हवा
उठती रहती, दोपहर के बाद जब गर्मी बढ़ जाती तो बास मारने लगती थी। कभी-कभी समस्या गंभीर
हो जाती तो आस-पास के घरवाले उस तरफ की खिड़की बन्द कर लेते थे। पास से गुजरनेवाले
नाक पर रूमाल डाल लेते थे,यदि बहुत दिक्कत होती तो उधर से मुँह फेर लेते या
रास्ता बदल लेते थे।
Tuesday, 28 June 2016
Saturday, 4 June 2016
सवेरे का सपना
मैं
जब जागी तो सवेरा हो चुका था. सूरज की रोशनी बरामदे में आ चुकी थी. स्ट्रीट लाईट
का तेज प्रकाश कांच के बल्ब के मध्य एक बिन्दू पर सिमट गया था. घुप्प अंधकार को चीरता
हुआ कोई तेज प्रकाश पुंज जब आंखों में लगता है तो चुभन होने लगती है. ठीक उसी तरह फर्श
की सतह से परावर्तित किरणें जब मेरी आंखों से टकराई तो मुझे चुभन महसूस होने लगी,
मैं उठकर बैठ गई और दोनों हथेलियों में आंखों को छुपा लिया.
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