भोर का
समय था। ट्रेन के स्टेशन पर रूकते ही लोगों का चढना-उतरना शुरू हो गया । उतरने
वालों में कुछ लोग वे थे जिनका गंतव्य आ चुका था और कुछ वे जो गर्मी के मारे बेहाल
थे तथा प्लेटफार्म पर ठंढी हवा में जी भर साँस लेना चाहते थे। चढनेवालों में कुछ
यात्री थे तथा कुछ चायवाले, दातुन वाले, खोमचे वाले जो सामान बेच रहे थे।
Saturday, 12 November 2016
Tuesday, 28 June 2016
तमाशबीन
मुहल्ले के नुक्कड़ पर एक नीम का पेड़ था
और उसके नीचे कूड़े का ढ़ेर… पॉलिथीन की थैलियाँ, कागज के टुकड़े, सड़ी हुईं सब्जियाँ,
रसोई के कचरे, जूठन, गोबर इत्यादि यत्र-तत्र फैले हुये थे, जिससे बदबू भरी हवा
उठती रहती, दोपहर के बाद जब गर्मी बढ़ जाती तो बास मारने लगती थी। कभी-कभी समस्या गंभीर
हो जाती तो आस-पास के घरवाले उस तरफ की खिड़की बन्द कर लेते थे। पास से गुजरनेवाले
नाक पर रूमाल डाल लेते थे,यदि बहुत दिक्कत होती तो उधर से मुँह फेर लेते या
रास्ता बदल लेते थे।
Saturday, 4 June 2016
सवेरे का सपना
मैं
जब जागी तो सवेरा हो चुका था. सूरज की रोशनी बरामदे में आ चुकी थी. स्ट्रीट लाईट
का तेज प्रकाश कांच के बल्ब के मध्य एक बिन्दू पर सिमट गया था. घुप्प अंधकार को चीरता
हुआ कोई तेज प्रकाश पुंज जब आंखों में लगता है तो चुभन होने लगती है. ठीक उसी तरह फर्श
की सतह से परावर्तित किरणें जब मेरी आंखों से टकराई तो मुझे चुभन महसूस होने लगी,
मैं उठकर बैठ गई और दोनों हथेलियों में आंखों को छुपा लिया.
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